इक तरह से ये भी तो अच्छा हुआ
उस का शहज़ादे से इक रिश्ता हुआ
वक़्त हर ज़ख़्मों को भर देता है दोस्त
पर हमारे साथ तो उल्टा हुआ
इक उदासी की वजह तो ये भी है
पूछता कोई नहीं है क्या हुआ
है हवा पर छोड़ रक्खा मैं ने सब
इक दिया हूँ दरिया में बहता हुआ
इक मैं हूँ इक उस की है तस्वीर और
कमरे में है हुक्का इक जलता हुआ
फिर न शायद आए मंज़र ये कभी
देख लो तुम आदमी मरता हुआ
— AKASH















