AKASH
AKASH
Ghazal

इक तरह से ये भी तो अच्छा हुआ

उस का शहज़ादे से इक रिश्ता हुआ

वक़्त हर ज़ख़्मों को भर देता है दोस्त
पर हमारे साथ तो उल्टा हुआ

इक उदासी की वजह तो ये भी है
पूछता कोई नहीं है क्या हुआ

है हवा पर छोड़ रक्खा मैं ने सब
इक दिया हूँ दरिया में बहता हुआ

इक मैं हूँ इक उस की है तस्वीर और
कमरे में है हुक्का इक जलता हुआ

फिर न शायद आए मंज़र ये कभी
देख लो तुम आदमी मरता हुआ

— AKASH

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