हम पर नहीं है गर यक़ीं कोई नहीं
है आप के जैसा कहीं कोई नहीं
है दुश्मनी में यार जायज़ सब मगर
कहता कोई है आफ़रीं कोई नहीं
उस के लबों की है तलब रखते कई
अब चूमता उस की जबीं कोई नहीं
या'नी उसे भी अब सताता हिज्र है
या'नी ख़ुशी कोई नहीं कोई नहीं
आँखों से निकले हम तुम्हारी तो खुला
है भूलता क्यूँ सर
ज़मीं कोई नहीं
— AKASH















