aankhoñ men jo ek KHvaab sa hai | आँखों में जो एक ख़्वाब सा है

  - Akhtar Saeed Khan

आँखों में जो एक ख़्वाब सा है
आलम क्या क्या दिखा रहा है

आलम इक इंतिज़ार का है
खुलता नहीं इंतिज़ार क्या है

क़तरा क़तरा जो पी चुका है
दरिया दरिया पुकारता है

क्या कह गई ज़िंदगी की आहट
जो है किसी सोच में खड़ा है

ऐ मौज-ए-नसीम-ए-सुब्ह-गाही
हर ग़ुंचे का दिल धड़क रहा है

तुम और ज़रा क़रीब आ जाओ
ख़ंजर रग-ए-जाँ तक आ गया है

है दीदनी रंग-ए-रू-ए-क़ातिल
हर ज़ख़्म जवाब माँगता है

ऐ दश्त-ए-जुनूँ गवाह रहना
काँटे हैं और इक बरहना-पा है

आसार अच्छे नहीं शब-ए-हिज्र
दिल को कुछ क़रार सा है

लफ़्ज़ों को ज़बान मिल रही है
शायद 'अख़्तर' ग़ज़ल-सरा है

  - Akhtar Saeed Khan

Duniya Shayari

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