खुले हैं मश्रिक-ओ-मग़रिब की गोद में गुलज़ार

मगर ख़िज़ाँ को मुयस्सर नहीं यक़ीन-ए-बहार

ख़बर नहीं है बमों के बनाने वालों को
तमीज़ हो तो मह-ओ-मेहर-ओ-कहकशाँ हैं शिकार

उसी से तेग़-ए-निगह आब-दार होती है
तुझे बताऊँ बड़ी शय है जुरअत-ए-इंकार

किए हैं शौक़ ने पैदा हज़ार वीराने
इक आरज़ू ने बसाए हैं लाख शहर-ए-दयार

नशात-ए-सुब्ह-ए-बहाराँ तुझे नसीब नहीं
तिरे निगह में है बीती हुई शबों का ख़ुमार

फ़रोख़्त होती है इंसानियत सी जिंस-ए-गिराँ
जहाँ को फूँक न देगी ये गर्मी-ए-बाज़ार

यही है ज़ीनत-ओ-आराइश उरूस-ए-सुख़न
मगर फ़रेब भी देती है शोख़ी-ए-गुफ़्तार

— Ali Sardar Jafri

More by Ali Sardar Jafri

Other ghazal from the same pen

See all from Ali Sardar Jafri →

Fantasy Shayari

Shers of fantasy.

All Fantasy Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling