नफ़रत को अब प्यार के रस्ते मोड़े कोई

उस रस्ते की हर दीवारें तोड़े कोई

मैं भी तब इक उम्दा शाइ'र कहलाऊँगा
मेरा दिल जब आ कर दिलबर तोड़े कोई

क्यूँ आ जाते हैं ये तारे पहरा देने
चाँद को तन्हा रहने लाइक़ छोड़े कोई

ग़ुलशन के ग़ुल इस ख़ातिर खिलते हैं मजनू
अपनी लैला को देने को तोड़े कोई

वो कुछ इस मानिंद ख़फ़ा हो हम से यारा
कस कर पकड़े, फिर धीरे से, छोड़े कोई

इस ख़ातिर हम भूल किए जाते हैं अक्सर
ग़ुस्से में ही मेरी बाँहें मोड़े कोई

इश्क़ किया दुनिया में जिस ने पहली बारी
अब उस को भी मुंसिफ़ मारे कोड़े कोई

— Satpreet Singh

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