जो चेहरे इस दिल को अज़बर हो जाते हैं

दूर वही आँखों से अक्सर हो जाते हैं

जो पल फूलों के जैसे हैं साथ तुम्हारे
बा'द तुम्हारे वो ही नश्तर हो जाते हैं

धोका खाओगे चाहत में तो जानोगे
कैसे शीशे से दिल पत्थर हो जाते हैं

तेरी सोहबत का ही जादू-वादू है ये
कितने दिलकश सारे मंज़र हो जाते हैं

अपने जैसा नहीं हुआ तू इस का क्या ग़म
हम ही तेरे जैसे 'जस्सर' हो जाते हैं

— Avtar Singh Jasser

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