नूर के जैसे बिख़र के देखता हूँ
इश्क़ में हद से गुज़र के देखता हूँ
कुछ सुकूँ हासिल मुझे हो जाए शायद
सर तेरे काँधे पे धर के देखता हूँ
सोचता हूँ ख़्वाब कर लूँ सब मुकम्मल
और फिर हालात घर के देखता हूँ
यूँँ सितम मुझ पर किए हैं ज़िन्दगी ने
ख़ुशनुमा मंज़र भी डर के देखता हूँ
जीते जी हासिल नहीं मुझ को हुई तू
अब तेरी ख़ातिर मैं मर के देखता हूँ
याद आता है मुझे इक गुलबदन, मैं
ज़ख़्म जब भी इस जिगर के देखता हूँ
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