ज़ख़्म यूँँ मेरे मुक़द्दर हो रहे हैं
हाल-ए-ज़ीस्त बद से बदतर हो रहे हैं
तेरी हिजरत की कबाहत इन पे गुज़री
फूल तेरे बा'द पत्थर हो रहे हैं
एक क़तरा तक नहीं मुझ
में ख़ुशी का
ग़म समुंदर-दर-समुंदर हो रहे हैं
तन्हा जीना खेल नईं है, हम से पूछो
घर हमारे कैसे खंडर हो रहे हैं
— Chandrajeet Regar















