फैला अजब ग़ुबार है आईना-गाह में

मुश्किल है ख़ुद को ढूँढ़ना अक्स-ए-तबाह में

जल-बुझ चुका है ख़्वाहिश-ए-नाकाम से वजूद
परछाईं फिर रही है मकान-ए-सियाह में

मैं वो अजल-नसीब कि क़ातिल हूँ अपना-आप
होता हूँ रोज़ क़त्ल किसी क़त्ल-गाह में

रक्खा गया हूँ इज़्ज़त-ओ-तौक़ीर का असीर
बाँधा गया है सर को ग़ुरूर-ए-कुलाह में

हलकान में नहीं तिरी ख़ातिर सर-ए-हुजूम
सब मर रहे हैं हसरत-ए-यक-दो-निगाह में

— Ejaz Gul

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