अपना तुम्हें जो कह उठे दीवाना-वार हम
कुछ बे-क़रार आप थे कुछ बे-क़रार हम
क़ाएम हैं फूल ख़ार से गुलशन की रौनक़ें
हुस्न-ए-बहार आप हैं दर्द-ए-बहार हम
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ के असरार खुल गए
अपने अलम के जब से हुए राज़दार हम
उड़ती है ख़ाक जैसे हवाओं के साथ साथ
पहुँचे हैं मंज़िलों पे यूँँ मिस्ल-ए-ग़ुबार हम
पुर-नूर जिस के नूर से शाम-ए-अलम हुई
उस 'रौशनी' को ढूँडते हैं बे-क़रार हम
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