ज़िंदगी इक वबाल है साहब
अब तो जीना मुहाल है साहब
आप जो कुछ कहें वही सच है
बे-सबब क़ील-ओ-क़ाल है साहब
आप की बे-रुख़ी हमारे लिए
ज़िंदगी का सवाल है साहब
ग़म-ए-दुनिया हो या ग़म-ए-उक़्बा
ने'मत-ए-ला-ज़वाल है साहब
उस ने पूछा है आज मेरा मिज़ाज
अब तबीअत बहाल है साहब
हम मोहब्बत की बात करते हैं
आप का क्या ख़याल है साहब
ज़ख़्म अब कैसे हम दिखाएँ 'हबाब'
एक टेढ़ा सवाल है साहब
— Habab Hashmi















