“मुझे अपने इश्क़ पर नाज़ होता है”

सुनो मैं तुम्हें बेहद चाहता हूँ
तुम कहोगी ये कोई नई बात नहीं है
हाँ ये भी सही है
तुम्हारे चाहने वाले तो कई हैं
पर शुक्रगुज़ार हूँ मैं उस रब का
जो तुम फिर भी मुझ को चाहती हो
हँसाती हो, रुलाती हो, सताती हो
मगर मेरा साथ भी बख़ूबी निभाती हो
ख़ुद बेवकूफ़ाना हरकत देती हो और
मुझ को ही पागल ठहराती हो
तुम्हारी इन्हीं नादानियों ने ही तो
खींच रखा है मुझे तुम्हारी ओर
हर रोज़ मन के मंदिर में
तुम्हारे नाम का ही होता है शोर
तुम्हारे नाम से रात, तुम्हारे नाम से कल
और तुम्हारे नाम से ही मेरा आज होता है
जब भी तुम मेरी वजह से मुस्कुराती हो
क़सम से मुझे अपने इश्क़ पर नाज़ होता है

— Harsh saxena

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