ये जहाँ है हिसार औरत का

है सभी पर उधार औरत का

ख़ूबियाँ और भी हैं उस
में पर
सबने देखा निखार औरत का

आदमी को तो फिर भी छुट्टी है
रह्न है पर करार औरत का

रौनक़े घर की सब इन्हीं से हैं
घर करे इंतिज़ार औरत का

जन्म औरत की कोख से ले कर
मर्द करते शिकार औरत का

घर में सब का ख़याल रखती है
है यही रोज़गार औरत का

— Himanshu Upadhyay Som

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