ye jahaan hai hisaar aurat ka | ये जहां है हिसार औरत का

  - Himanshu Upadhyay Som

ये जहां है हिसार औरत का
है सभी पर उधार औरत का

खूबियाँ और भी हैं उसमें पर
सबने देखा निखार औरत का

आदमी को तो फिर भी छुट्टी है
रह्न है पर करार औरत का

रौनक़े घर की सब इन्हीं से हैं
घर करे इंतज़ार औरत का

जन्म औरत की कोख से लेकर
मर्द करते शिकार औरत का

घर में सब का ख़्याल रखती है
है यही रोज़गार औरत का

  - Himanshu Upadhyay Som

Intezaar Shayari

Our suggestion based on your choice

    गली में बैठे हैं उसकी नज़र जमाए हुए
    हमारे बस में फ़क़त इंतिज़ार करना है
    Swapnil Tiwari
    23 Likes
    बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
    कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
    Allama Iqbal
    31 Likes
    जानता है कि वो न आएँगे
    फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल
    Faiz Ahmad Faiz
    42 Likes
    कोई इशारा दिलासा न कोई वादा मगर
    जब आई शाम तिरा इंतिज़ार करने लगे
    Waseem Barelvi
    59 Likes
    हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
    रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया
    Gulzar
    46 Likes
    मैं बहुत जल्द लौट आऊँगा
    तुम मिरा इंतिज़ार मत करना
    Liaqat Jafri
    31 Likes
    जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना
    वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था
    Jaun Elia
    72 Likes
    तू वो बहार जो अपने चमन में आवारा
    मैं वो चमन जो बहाराँ के इंतिज़ार में है
    Ali Sardar Jafri
    30 Likes
    जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
    ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा
    Ada Jafarey
    29 Likes
    ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
    वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं
    Faiz Ahmad Faiz
    18 Likes

More by Himanshu Upadhyay Som

As you were reading Shayari by Himanshu Upadhyay Som

    लोग जो दिल के पास होते हैं
    दूर उनके निवास होते हैं
    Himanshu Upadhyay Som
    हरम दिल का न ख़ाली था हमारा
    रहा करता था इक शैदा हमारा

    उसी के ख़्वाब थे मन्ज़िल हमारी
    उसी की नींद थी रस्ता हमारा

    तुम्हारे साथ जब ये हाल है तो
    तुम्हारे बाद क्या होगा हमारा

    जहाँ पर साथ छोड़ा हमसफ़र ने
    वहीं पर रुक गया रस्ता हमारा

    ग़ज़ल कैसे मुकम्मल ये करें हम
    मुआ मतला नही बनता हमारा

    किसी के दिल पे क़ाबू क्या करें हम
    हमीं पर बस नहीं चलता हमारा

    विकारों को गिराया हमने जब तब
    बहुत ऊँचा उठा पलड़ा हमारा

    गुलों के साथ हम भी कुचले जाते
    मगर काँटों से था रिश्ता हमारा
    Read Full
    Himanshu Upadhyay Som
    हो अकेले तो इसमें ग़म क्या है,
    दीप में रहता है गुहर तन्हा
    Himanshu Upadhyay Som
    तख़ल्लुस मेरा याद आएगा तुमको
    "महादेव" को जब पुकारा करोगे
    Himanshu Upadhyay Som
    ख़ूबसूरत गुलाब सी लड़की
    हमने देखी है ख़्वाब सी लड़की

    बाल हैं स्याह रात के जैसे
    रुख़ से है माहताब सी लड़की

    राज़ खुद में कई समेटे हुए
    बंद है वो किताब सी लड़की

    प्यार ऊँचाइयों से है उसको
    उड़ती फिरती उक़ाब सी लड़की

    सब मुसाफिर हैं इक मरुस्थल के
    और वो है यख़ आब सी लड़की

    एक लम्हें में हो गई गायब
    एक दिलकश सराब सी लड़की
    Read Full
    Himanshu Upadhyay Som

Similar Writers

our suggestion based on Himanshu Upadhyay Som

Similar Moods

As you were reading Intezaar Shayari Shayari