हरम दिल का न ख़ाली था हमारा

रहा करता था इक शैदा हमारा

उसी के ख़्वाब थे मन्ज़िल हमारी
उसी की नींद थी रस्ता हमारा

तुम्हारे साथ जब ये हाल है तो
तुम्हारे बा'द क्या होगा हमारा

जहाँ पर साथ छोड़ा हम सेफ़र ने
वहीं पर रुक गया रस्ता हमारा

ग़ज़ल कैसे मुकम्मल ये करें हम
मुआ मतला नहीं बनता हमारा

किसी के दिल पे क़ाबू क्या करें हम
हमीं पर बस नहीं चलता हमारा

विकारों को गिराया हम ने जब तब
बहुत ऊँचा उठा पलड़ा हमारा

गुलों के साथ हम भी कुचले जाते
मगर काँटों से था रिश्ता हमारा

— Himanshu Upadhyay Som

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