Hukm
Hukm
Ghazal

जैसे डिब्बे जोड़ के गाड़ी बनती है

हम दोनों की बिल्कुल वैसी बनती है

जिन कानों में तुम सरगो़शी करते हो
उन कानों की जीभ से अच्छी बनती है

काफ़ी मुमकिन है वो ना ही बोलेगी
एक दफ़ा पर बात तो करनी बनती है

आ इक दूजे की आँखों में सैर करें
जितनी देर में उस की काॅफी़ बनती है

अब तेरी तनख़्वाह पे निर्भर करता है
'हुक्म' तुम्हारे घर क्या सब्ज़ी बनती है

— Hukm

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