ग़ज़ल हो गई जब भी सोचा तुम्हें

फ़साने बने जब भी लिक्खा तुम्हें

कभी धूप हो तुम कभी चाँदनी
समझ कर भी कोई न समझा तुम्हें

ग़रज़ कोई सूरज से हम को नहीं
सहर हो गई जब भी देखा तुम्हें

मुझे अपने दिल पर बड़ा नाज़ है
बड़े नाज़ से जिस ने रक्खा तुम्हें

कभी मेरी आँखों में झाँको ज़रा
यहाँ कोई तुम सा मिलेगा तुम्हें

ये थी 'अश्क' साहब की दीवानगी
थे तुम रू-ब-रू फिर भी ढूँडा तुम्हें

— Ibrahim Ashk

More by Ibrahim Ashk

Other ghazal from the same pen

See all from Ibrahim Ashk →

Sooraj Shayari

Shers of sooraj.

All Sooraj Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling