किसी के दिल का सुकून बन कर किसी का मातम बनी हुई है
बिछड़ के मुझ से वो एक लड़की किसी की जानम बनी हुई है
किया जो इज़हार-ए-इश्क मैं ने वो मुझ को नाराज़ लग रही थी
मगर मना भी नहीं किया सो उमीद क़ाएम बनी हुई है
जो उस की मुश्किल वो मेरी मुश्किल जो मेरी मुश्किल वो मेरी मुश्किल
तमाम ग़म मुझ को दे दिए हैं वो ख़ुद तो बे-ग़म बनी हुई है
— junaid khan















