वो भी क्या दिन थे कि हासिल मुझ को तेरा प्यार था
एक पल इंकार था और एक पल इक़रार था
वो भी क्या दिन थे यहाँ गुलज़ार था और यार था
इस जगह नोकीले ख़ारों का बड़ा अम्बार था
रास्तों के पेच-ओ-ख़म की फ़िक्र थी वल्लाह किसे
ये तसल्ली थी कि मेरे साथ मेरा यार था
ज़िंदगी के गोशे गोशे में तलाशा था जिसे
मिल गया मुझ को वो जब मेरे लिए बेकार था
चंदा मामा की कहानी नन्हे बच्चों ने सुनी
चाँद पर जाना तो पिछले दौर में दुश्वार था
इक ज़माना जिस को कहता था 'कलीम-ए-ताहिरी'
याद है इस शहर में इतना बड़ा फ़नकार था
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