अपनी तक़दीर पर यूँँ सितम लिखते हैं
जो नहीं मेरा उस को सनम लिखते हैं
हर्फ़ -दर -हर्फ़ बस दर्द-ए-दिल ही बयाँ
रख लबों पे हँसी चश्म-ए-नम लिखते हैं
हिज्र के लम्हे काटे नहीं कटते अब
रात दिन एक तेरा अलम लिखते हैं
तेरे होने से रौशन है मेरा जहाँ
साथ तेरे ज़मीं पर इरम लिखते हैं
तेरे ही नाम से बस जुड़े मेरा नाम
बिन तेरे ज़िन्दगी अपनी सम लिखते हैं
जगमगा जाता है दिल का बुत-ख़ाना ,जब
रब तुझे और तेरे करम लिखते हैं
इश्क़ में तेरे मसरूफ़ियत बढ़ गई
इस लिए आजकल ग़ज़लें कम लिखते हैं
— Priya omar















