तुझ से वा'दा अज़ीज़-तर रक्खा

वहशतों को भी अपने घर रक्खा

अपनी बे-चेहरगी छुपाने को
आईने को इधर उधर रक्खा

इक तिरा ग़म ही अपनी दौलत थी
दिल में पोशीदा बे-ख़तर रक्खा

आरज़ू ने कमाल पहचाना
और तअल्लुक़ को ताक़ पर रक्खा

इस क़दर था उदास मौसम-ए-गुल
हम ने आब-ए-रवाँ पे सर रक्खा

अपनी वारफ़्तगी छुपाने को
शौक़ ने हम को दर-ब-दर रक्खा

क़लमा-ए-शुक्र कि मोहब्बत ने
हम को तम्हीद-ए-ख़्वाब पर रक्खा

उन को समझाने अपना हर्फ़-ए-सुख़न
आँसुओं को पयाम पर रक्खा

— Kishwar naheed

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