हुस्न के प्यार के सुख दुख के तराने गुम हैं
वक़्त की गोद में क्या क्या न ख़ज़ाने गुम हैं
दूर तक ग़म का धुआँ एक भयानक सा समाँ
अब रुकें भी तो कहाँ सारे ठिकाने गुम हैं
किस को मालूम है तारीख़ के तह-ख़ानों में
कितने ख़्वाबों के जहाँ कितने ज़माने गुम हैं
कोई मय-ख़ाना रहा न कोई वीराना रहा
दो ही बस अपने ठिकाने थे ठिकाने गुम हैं
साज़ भी रूठ गए तार भी सब टूट गए
बहर-ए-ख़ामोश में 'मदहोश' तराने गुम हैं
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