रूह पर डाले हैं पर्दे जिस्म के
सब को रहते बस ये नखरे जिस्म के
जो लगे चमकाने में फिर जिस्म को
लग गए है रोग सारे जिस्म के
लड़कियों को क्यूँ ये लगता रहता है
सिर्फ़ लड़के होते भूखे जिस्म के
हुस्न दो पल का तुम्हारा अब हमें
तुम पढ़ाओगी पहाड़े जिस्म के
जान तो इन
में बची अब है नहीं
फूँक दो फिर जाके पुतले जिस्म के
मौत बैठी रहती धोबीघाट पे
बाँधती है सबके कपड़े जिस्म के
— Manas Ank















