कहता था सब से अच्छा जिस को जहाँ कहाँ है
हम बुलबुलें थीं जिस की वो गुलसिताँ कहाँ है
तहज़ीब और तमद्दुन वो सब्र वो तहम्मुल
जिस हिन्द की सिफ़त थी वो आज याँ कहाँ है
जन्नत थी जो ज़मीं की सरताज था जहाँ का
था रश्क जिस पे अब वो बाग़-ए-जिनाँ कहाँ है
कहलाता था कभी जो सोने की एक चिड़िया
उस ख़ुश-नुमा वतन का नाम-ओ-निशाँ कहाँ है
हर इक नज़र में वहशत हर सम्त है क़यामत
जो अम्न का था घर वो हिन्दोस्ताँ कहाँ है
बरसों से जिस के तट पर करते थे सब इबादत
आब-ए-हयात सी वो गंगा रवाँ कहाँ है
है राम और गौतम ख़्वाजा की सर-ज़मीं जो
आज उन की उस ज़मीं पे अम्न-ओ-अमाँ कहाँ है
सुनता नहीं ज़माना मज़लूम की सदाएँ
जो बेकसों की सुन ले वो आसमाँ कहाँ है














