dhamki mein mar gaya jo na baab-e-nabard tha | धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था

  - Mirza Ghalib

धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था
इश्क़-ए-नबर्द-पेशा तलबगार-ए-मर्द था

था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ
उड़ने से पेश-तर भी मिरा रंग ज़र्द था

तालीफ़ नुस्ख़ा-हा-ए-वफ़ा कर रहा था मैं
मजमुआ-ए-ख़याल अभी फ़र्द फ़र्द था

दिल ता जिगर कि साहिल-ए-दरिया-ए-ख़ूँ है अब
इस रहगुज़र में जल्वा-ए-गुल आगे गर्द था

जाती है कोई कश्मकश अंदोह-ए-इश्क़ की
दिल भी अगर गया तो वही दिल का दर्द था

अहबाब चारासाज़ी-ए-वहशत न कर सके
ज़िंदाँ में भी ख़याल बयाबाँ-नवर्द था

ये लाश-ए-बे-कफ़न 'असद'-ए-ख़स्ता-जाँ की है
हक़ मग़्फ़िरत करे अजब आज़ाद मर्द था

  - Mirza Ghalib

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