aabroo kya KHaak us gul ki ki gulshan men nahin | आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं

  - Mirza Ghalib
आबरूक्याख़ाकउसगुलकीकिगुलशनमेंनहीं
हैगरेबाँनंग-ए-पैराहनजोदामनमेंनहीं
ज़ोफ़सेगिर्याकुछबाक़ीमिरेतनमेंनहीं
रंगहोकरउड़गयाजोख़ूँकिदामनमेंनहीं
होगएहैंजमाअजज़ा-ए-निगाह-ए-आफ़ताब
ज़र्रेउसकेघरकीदीवारोंकेरौज़नमेंनहीं
क्याकहूँतारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़मअंधेरहै
पुम्बानूर-व-सुब्हसेकमजिसकेरौज़नमेंनहीं
रौनक़-ए-हस्तीहैइश्क़-ए-ख़ानावीराँसाज़से
अंजुमनबे-शमाहैगरबर्क़ख़िर्मनमेंनहीं
ज़ख़्मसिलवानेसेमुझपरचारा-जुईकाहैतान
ग़ैरसमझाहैकिलज़्ज़तज़ख़्म-ए-सोज़नमेंनहीं
बस-किहैंहमइकबहार-ए-नाज़केमारेहुए
जल्वा-ए-गुलकेसिवागर्दअपनेमदफ़नमेंनहीं
क़तराक़तराइकहयूलाहैनएनासूरका
ख़ूँभीज़ौक़-ए-दर्दसेफ़ारिग़मिरेतनमेंनहीं
लेगईसाक़ीकीनख़वतक़ुल्ज़ुम-आशामीमिरी
मौज-ए-मयकीआजरगमीनाकीगर्दनमेंनहीं
होफ़िशार-ए-ज़ोफ़मेंक्याना-तवानीकीनुमूद
क़दकेझुकनेकीभीगुंजाइशमिरेतनमेंनहीं
थीवतनमेंशानक्या'ग़ालिब'किहोग़ुर्बतमेंक़द्र
बे-तकल्लुफ़हूँवोमुश्त-ए-ख़सकिगुलख़नमेंनहीं
  - Mirza Ghalib
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Gareebi Shayari

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