जितना गुमान से ज़ुल्फ़ों को सँवारा गया
उतना ईमान से ये बेसहारा गया
आप के हाथ में पत्थर क्यूँ नहीं है
आप की तरफ़ भी तो इशारा गया
आप को तो सौ ख़ून माफ थे
आपसे ये बेचारा न मारा गया
आदमी जंगल में था तो ठीक था
शहर में बसा कि मारा गया
लहू लहू में फर्क नहीं है
आप के क़त्ल पे मैं भी मारा गया
— Murli Dhakad















