ख़्वाब टूटता है तो वो उस के निशां ढूँढ़ता है
चाँद फ़लक पर है, ज़मीं पर कहाँ ढूँढ़ता है
तेरे ही अंदर है ये कसक साक़ी रुक जा
क्यूँ बे-इंतिहा दौड़ता है, यहाँ-वहाँ ढूँढ़ता है
मुझ से मेरा वजूद तो छूटा जाता है पर मुझ
में
कोई बेहद खिंचता है और इंसान ढूँढ़ता है
मेरी किस्मत तेरी किस्मत के फसाने सुनती है
मेरा लहू तेरे लहू के निशान ढूँढ़ता है
बस्ती पे बस्ती बसती जाती है और
गुम होते हुए इंसान को इंसान ढूँढ़ता है
किसी नग
में, किसी ग़ज़ल, किसी मय के प्याले में
'रिंद' अपनी अनहद का मकान ढूँढ़ता है
— Murli Dhakad















