नहीं थीं मौजूद तुम, मैं साथी नहीं बनाता अजीब लगता

तमाम मेज़ों पे जोड़े बैठे थे मैं अकेला अजीब लगता

दुकाँ बना कर जवाज़ पैदा किया है मौजूदगी का अपनी
बग़ैर मक़सद के मैं तिरे रास्ते में बैठा अजीब लगता

वो पास आया तो देखना छोड़ कर उसे चूमने लगा मैं
शराब-ख़ाने में बैठ कर सादा पानी पीता अजीब लगता

तिरी मुहब्बत के जाल में फँसके मैं ने तेरा भरम रखा है
अगर परिंदा न क़ैद होता तो ख़ाली पिंजरा अजीब लगता

नुमायाँ होने का आम हुलिए में आके मौक़ा गँवा दिया है
सभी तवज्जोह से देखते दोस्त अगर तू थोड़ा अजीब लगता

— Nadir Ariz

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