न चाहत से न यादों से न वादों से न ख़्वाबों से
ग़ज़ल का कार-ख़ाना चल रहा है बस अज़ाबों से
उदासी रंग बन कर हर वरक़ पर फैल जाती है
तेरी तस्वीर होती है जुदा जब भी क़िताबों से
सर-ए-शब आसमाँ में दो सितारे जैसे दिखते हैं
तिरी आँखें भी कुछ वैसी ही दिखती हैं हिजाबों से
चराग़ों ने भी तो 'नीरज' तवज्जोह सबकी खोई है
परेशाँ सिर्फ़ रातें ही नहीं हैं आफ़ताबों से
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