उलझे हुए हैं कब से इसी इक सवाल में
आते हैं हम भी क्या कभी तेरे ख़याल में
दीवानों में से उस ने किसी इक को जब चुना
कुछ मर गए थे रश्क से बाक़ी मलाल में
सारे जहाँ के गुल की है तासीर लग गई
देने को तेरी एक हँसी की मिसाल में
पहले तो टूट कर मियाँ चाहो किसी को तुम
आता तभी मज़ा भी है हिज्र-ओ-विसाल में
— Neeraj jha















