दुनिया में मेरे दुख को दो चार समझते हैं
कहते हैं सभी लेकिन हाँ यार समझते हैं
आप अपने इशारों से करते हैं बयाँ जो भी
बच्चे नहीं हैं हम सब सरकार समझते हैं
कोई न गिला रक्खा निस्बत भी नहीं रक्खी
अब आप हमें मतलब बेकार समझते हैं
जिन को नहीं हासिल तू उन का ये तख़य्युल है
वो फूल को ही तेरे रुख़्सार समझते
— Neeraj jha















