उठनेमेंदर्द-ए-मुत्तसिलहूँमैं
गर्द-बाद-ए-ग़ुबार-ए-दिलहूँमैं
काबेतकसाथआयाशौक़-ए-सनम
हाएबुत-ख़ानाक्याख़जिलहूँमैं
हैफ़किसमुद्दईकीजाँहैतू
हाएकिसआश्नाकादिलहूँमैं
तुझकोदूँक्याजवाबऐदावर
अपनेहीआपमुन्फ़इलहूँमैं
तेरीनाज़ुकतनीपेग़ौरनकी
अपनीउम्मीदसेख़जिलहूँमैं
नहिलाउसकेदरसेता-महशर
मरक़द-ए-आरज़ूकीसिलहूँमें
ख़ाक-ए-हस्तीकीगर्द-बादहैतू
आतिश-ए-दिलकीआब-ओ-गिलहूँमैं
हदनहींकोईअपनीहालतकी
किनिगाहोंमेंमुंतक़िलहूँमैं
छागयायेतसव्वुरउसबुतका
नक़्श-ए-चींऔरबुत-ए-चगिलहूँमैं
ज़र्रासीज़िंदगीपहाड़हुई
आँखकाअपनीआपतिलहूँमैं
ऐ'क़लक़'क्यूँँकिछोड़दूँवहशत
वज़्अ'''मेंअपनीमुस्तक़िलहूँमैं