Qalaq Merathi

Qalaq Merathi

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Qalaq Merathi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qalaq Merathi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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हो जुदा ऐ चारा-गर है मुझ को आज़ार-ए-फ़िराक़
बे-विसाल अच्छा हुआ भी कोई बीमार-ए-फ़िराक़

शोख़ी-ए-पर्दा-नशीं की इश्वा-साज़ी देखना
दिल है बदमस्त-ए-विसाल और दीदा बेदार-ए-फ़िराक़

एक नाले में फिरेगा मेहर-ओ-मह को ढूँढता
ऐ फ़लक मत छेड़ मुझ को हूँ अज़ा-दार-ए-फ़िराक़

वस्ल थी मेरी सज़ा हिज्र इंतिक़ाम-ए-ग़ैर था
कब हुआ ख़ू-करदा-ए-हिज्राँ गिरफ़्तार-ए-फ़िराक़

कोई करता है ख़ता और कोई पाता है सज़ा
ग़ैर गुस्ताख़-ए-विसाल और मैं सज़ा-वार-ए-फ़िराक़

दम-ब-दम बिजली गिरे या नहर-ए-ख़ूँ जारी रहे
इल्तियाम इस सीने का क्या जो है अफ़गार-ए-फ़िराक़

आँख कब लगती है हीले से जो तुझ से लग गई
दास्तान-ए-वस्ल कब सुनता है बेदार-ए-फ़िराक़

दाम में सय्याद के क्यूँँ कि न बुलबुल मर रहे
दामन-ए-हर-बर्ग-ए-गुल में था निहाँ ख़ार-ए-फ़िराक़

सौ बहार आए मगर जाता है कोई दाग़-ए-दिल
लाला-ओ-गुल का नहीं मुश्ताक़ ख़ूँ-बार-ए-फ़िराक़

अब 'क़लक़' ठोकर से तेरी जी चुका मरने के बा'द
आश्ना-ए-वस्ल कब हो नाज़-बरदार-ए-फ़िराक़
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Qalaq Merathi
मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
जो हो सकता है वो भी आदमी से हो नहीं सकता

ये कहना है तो क्या कहना कि कहते कहते रुक जाना
बयान-ए-हसरत-ए-दिल भी तो जी से हो नहीं सकता

उचटती सी निगाहें कब जिगर के पार होती हैं
करो ख़ूँ दोस्त बन कर दुश्मनी से हो नहीं सकता

हमें क्यूँ दिल दिया और दिलरुबाई उन में क्यूँ रक्खी
ख़ुदा दुश्मन बुतों की बंदगी से हो नहीं सकता

दम-ए-रुख़्सत वो मुझ को देख कर बे-ख़ुद तो क्या होगा
न उठने दें उन्हें ये भी ग़शी से हो नहीं सकता

ब-रंग-ए-नाला किस किस धूम से उड़ता है रंग अपना
तिरी फ़ुर्क़त का पर्दा ख़ामुशी से हो नहीं सकता

'क़लक़' पैग़ाम तेरा और बयाँ फिर उस सितमगर से
किसी से हो नहीं सकता किसी से हो नहीं सकता
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Qalaq Merathi
नक़्श-बर-आब नाम है सैल-ए-फ़ना मक़ाम
इस ख़ानुमाँ-ख़राब का क्या नाम क्या मक़ाम

हर रोज़ ताज़ा मंज़िल ओ हर शब नया मक़ाम
मोहलत नहीं क़याम की दुनिया है क्या मक़ाम

जा मिल गई जिसे तिरी दीवार के तले
है उस को गोर-ए-तंग भी इक दिल-कुशा मक़ाम

डरते हैं हम तो नाम भी लेते हुए तिरा
तू ही बता कि पूछिए क्यूँँकर तिरा मक़ाम

इंसान की सरिश्त में है उज़्र-ए-लंग-ए-ज़ोफ़
साबित हुआ कि दूर है मुझ से मिरा मक़ाम

अंदाज़ा ही ग़लत था मगर इम्तियाज़ का
या'नी महल्ल-ए-ग़ैर ही था आप का मक़ाम

खिलता नहीं कभी न कभी साफ़ ही रहे
किस तरह हो सुबूत कि दिल है तिरा मक़ाम

वाइ'ज़ मुनाज़अत का सबब मुझ में तुझ में क्या
मस्जिद तिरा महल है मिरा मय-कदा मक़ाम

याँ वाँ इधर उधर यूँँ ही गिर-पड़ के की बसर
मिस्ल-ए-ग़ुबार-ए-राह रहा जा-ब-जा मक़ाम

ऐ अहल-ए-दैर ज़िक्र-ए-हरम तुम से या करें
पूछो बुतों ही से कभी का'बा भी था मक़ाम

क्या क्या बयाँ जहाँ के करें अम्न-ओ-चैन को
उस के भी दर पे अपना तो मुद्दत रहा मक़ाम

क्या जानिए 'क़लक़' कि इरादा है अपना क्या
मतलब से कुछ सफ़र न सर-ए-मुद्दआ' मक़ाम
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Qalaq Merathi
दूरी में क्यूँँ कि हो न तमन्ना हुज़ूर की
मंज़िल को मेरी क़ुर्ब से निस्बत है दूर की

फ़ुर्क़त ने उस की वस्ल की तशवीश दूर की
तस्कीं नहीं है यूँँ भी दिल-ए-ना-सुबूर की

मूसा के सर पे पाँव है अहल-ए-निगाह का
उस की गली में ख़ाक उड़ी कोह-ए-तूर की

कहता है अंजुमन को तिरी ख़ुल्द मुद्दई
इस बुल-हवस के दिल में तमन्ना है हूर की

वाइज़ ने मय-कदे को जो देखा तो जल गया
फैला गया चराँद शराब-ए-तहूर की

मूसा को क्यूँँ न मौज-ए-तजल्ली धकेल दे
जल्वे से उस के गुल हुई मशअ'ल शुऊ'र की

अरबाब-ए-वक़्त जानते हैं रोज़गार ने
की सहव से वफ़ा तो तलाफ़ी ज़रूर की

रुस्वाइयों का हौसला घट घट के बढ़ गया
सामाँ है ख़ामुशी मिरी शोर-ए-नुशूर की

मेल आसमाँ का सू-ए-ज़मीं बे-सबब नहीं
ज़ेर-ए-क़दम जगह है सर-ए-पुर-ग़ुरूर की

उस से न मिलिए जिस से मिले दिल तमाम उम्र
सूझी हमें भी हिज्र में आख़िर को दूर की

पामाल कर रहा है सियह-रोज़ियों का जोश
मिट्टी ख़राब है मिरे कलबे में नूर की

क्या एक क़ुर्ब-ए-ग़ैर का सदमा न पूछिए
हैं दिल के आस पास बला दूर दूर की

मज़मूँ मिरे उड़ाए 'क़लक़' सब ने इस क़दर
सुनता हूँ मैं तराना ज़बानी तुयूर की
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Qalaq Merathi
रिश्ता-ए-रस्म-ए-मोहब्बत मत तोड़
तोड़ कर दिल को क़यामत मत तोड़

काम-ए-नाकामी भी इक काम सही
तोड़ उम्मीद को हिम्मत मत तोड़

रात फ़ुर्क़त की पड़ी है ऐ दिल
एक ही नाले में ताक़त मत तोड़

उस की रहमत को न बे-कार समझ
मय-ओ-मयख़ाने की निय्यत मत तोड़

देख अच्छी नहीं ये ख़र-मस्ती
साग़र-ए-बादा-ए-फ़ुर्सत मत तोड़

ऐ दिल उम्मीद-ए-रिहाई मत बाँध
और आफ़त सर-ए-आफ़त मत तोड़

पूछ मत लज़्ज़त-ए-मय ऐ वाइज़
जानवर दाम-ए-शरीअत मत तोड़
सहन-ए-मस्जिद को किए जा पामाल
क़ैद-ए-आईन-ए-तरीक़त मत तोड़

मय-कदा देख के जन्नत को न भूल
हिर्स से बंद-ए-क़नाअत मत तोड़

इस का एहसान उठाना है हमें
गर्दन ऐ बार-ए-नदामत मत तोड़

ऐ 'क़लक़' बुत-कदे में बाँध एहराम
हम से लिल्लाह रिफ़ाक़त मत तोड़
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Qalaq Merathi
थक थक गए हैं 'आशिक़ दरमांदा-ए-फ़ुग़ाँ हो
यारब कहीं वो ग़फ़लत फ़रियाद-ए-बे-कसाँ हो

या क़हर है वो शोख़ी या पर्दा है नज़र का
दिल में तो उस का घर हो और आँख से निहाँ हो

ये शोर भर रहा है फ़रियाद का जहाँ में
जो बात लब पे आई उल्टी फिरी फ़ुग़ाँ हो

किस किस दु'आ को माँगें क्या क्या हवस निकालें
इक जाँ किधर किधर हो इक दिल कहाँ कहाँ हो

बरगश्तगी-ए-क़िस्मत ये छेड़ क्या निकाली
जो मुद्दआ-ए-दिल हो वो मुद्द'ई-ए-जाँ हो

मक़्दूर तक तो अपने तुझ से निभाएँगे हम
बे-जान-ओ-दिल हैं हाज़िर गर क़स्द-ए-इम्तिहाँ हो

सय्याद मैं नहीं हूँ गुम-कर्दा आशियाँ हूँ
ऐ हम-सफ़ीरो बोलो किस जा हो और कहाँ हो

ऐ आह दिल से उठ कर लब पर है क्या तअम्मुल
जा शोरिश-ए-ज़मीं हो आशोब-ए-आसमाँ हो

मिट मिट के भी हमारा इक बन रहेगा सामाँ
उजड़े अगर बहाराँ आबादी-ए-ख़िज़ाँ हो

जब बैठने पे आए ऐ ज़ोफ़ बैठ रहिए
फिर क्या है ये तकल्लुफ़ उस का ही आस्ताँ हो

तू ही रहेगी बुलबुल या मैं ही इस चमन में
या तेरा ही हो क़िस्सा या मेरी दास्ताँ हो

मेरे सुख़न में क्या है कुछ ख़ाल-ओ-ख़त बयाँ है
पर दिल से उस के पूछे जो कोई नुक्ता-दाँ हो

मेरा सलाम कहना झुक कर 'क़लक़' वही है
उस की गली में बैठा मौज़ूँ सा जो जवाँ हो
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Qalaq Merathi
किस क़दर दिलरुबा-नुमा है दिल
ख़ाना-ए-ग़ैर हो गया है दिल

हर घड़ी क्यूँँ न ज़लज़ले में रहे
मशहद-ए-हसरत-ओ-वफ़ा है दिल

मौत भी सहल कुछ नहीं अपनी
किस लिए ताक़त-आज़मा है दिल

मस्लहत इस में हो न कोई काश
दुश्मन-ए-जान हो गया है दिल

सब से लग चलने की हुई है खो
किस क़दर सर्फ़-ए-आश्ना है दिल

शैख़-ए-सनआँ का याद है क़िस्सा
सख़्त काफ़िर बुरी बला है दिल

अपनी हालत में मुब्तला हूँ आप
दिल-रुबा जाँ है जाँ-रुबा है दिल

बलबे वामांदगी की तेज़ रवी
जैसे जाने पे आ गया है दिल

किस जफ़ा-कार की वफ़ा है जाँ
किस सितम-कश का मुद्दआ' है दिल

तेरी उल्फ़त का नक़्द दाग़-ए-जिगर
मेरी हसरत का ख़ूँ-बहा है दिल

कहिए किस से लगा लिया लग्गा
ऐ 'क़लक़' क्यूँँ के लग चला है दिल
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Qalaq Merathi
चल दिए हम ऐ ग़म-ए-आलम विदाअ''
शोर-ए-मातम ता-कुजा मातम विदाअ''

जाते ही तेरे हर इक का कूच है
जाँ विदाअ'' ओ दिल विदाअ'' ओ दम विदाअ''

रोज़-ए-मय्यत भी नहीं कम ईद से
पहले रेहलत से हुआ हर ग़म विदाअ''

है क़यामत एक दिन उस का क़याम
दिल को कर ऐ तुर्रा-ए-ख़ुश-ख़म विदाअ''

उस का रस्ता कू-ए-ग़ैर और अपना ख़ुल्द
वो उधर रुख़्सत इधर हैं हम विदाअ''

ग़ैर की ख़ातिर है तो जाने भी दो
कीजिए उस को ख़ुश-ओ-ख़ुर्रम विदाअ''

हाए रे उम्र-ए-रवाँ का क़ाफ़िला
हर क़दम हर आन है हर दम विदाअ''

क्यूँँ न हों आग़ोश-ए-हसरत सुब्ह-ओ-शाम
रोज़-ओ-शब आलम से है आलम विदाअ''

है ब-क़द्र-ए-हौसला याँ इत्तिफ़ाक़
जाम से हरगिज़ न होगा जम विदाअ''

सुन चुका हूँ मैं तिरा अज़्म-ए-सफ़र
आँख से मेरी न होगा नम विदाअ''

हसरत-ए-बे-इख़्तियारी देखना
तन से जाँ होती है क्या थम थम विदाअ''

अब कहाँ सब्र-ओ-क़रार-ओ-ताब-ओ-होश
साथ ही इस के हुए पैहम विदाअ''

ला त'अय्युन बे निशानी ने किया
कीजिए आराम रुख़्सत रम विदाअ''

मोहलत-ए-रंग-ए-चमन ख़ूँ क्यूँँ न हो
हो गई जब फ़ुर्सत-ए-शबनम विदाअ''

ऐ 'क़लक़' चलिए कि मंज़िल दूर है
हो रहेंगे यार सब बाहम विदाअ''
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Qalaq Merathi
ऐ ख़ार ख़ार-ए-हसरत क्या क्या फ़िगार हैं हम
क्या हाल होगा उस का जिस दिल में ख़ार हैं हम

हर चंद दिल में तेरे ज़ालिम ग़ुबार हैं हम
कितने दबे हुए हैं क्या ख़ाकसार हैं हम

क्या जाने क्या दिखाए कम-बख़्त राज़-ए-दुश्मन
बे-इख़्तियार हो तुम और बे-क़रार हैं हम

वाँ शोख़ियों ने मारे नाकाम कैसे कैसे
याँ सादगी से क्या क्या उमीद-वार हैं हम

ने रख़्त मय-कदे में ने काबे का इरादा
हैं दिल लगी के बंदे यारों के यार हैं हम

वाँ सरगुज़िश्त-ए-दुश्मन वो कह रहे हैं मुँह पर
याँ बे-ख़ुदी है इस पर क्या राज़-दार हैं हम

साक़ी तिरी निगाहें कब तक रहेंगी पल्टी
है नश्शा ज़ाहिदों को और बादा-ख़्वार हैं हम

का'बा है संग-ए-बालीं ज़ोहाद-ए-ख़ुफ़्ता दिल का
और मय-कदे के अंदर शब-ज़िंदा-दार हैं हम

अल्लाह रे ज़र्फ़-ए-दिल का सब की जगह है इस में
बे-ग़म रहे है दुश्मन क्या ग़म-गुसार हैं हम

ऐ हश्र बच के चलना ऐ चर्ख़ हट के गिरना
है बर्क़ साया जिस का वो ख़ार-ज़ार हैं हम

इतनी ख़लिश मिज़ा की अब बढ़ गई कि गोया
ज़ख़्म-ए-दिल-ए-अदू में ख़ंजर-गुज़ार हैं हम

कब तक रहेगा दुश्मन जा
में से अपने बाहर
हो आग आग जिस से तुम वो शरार हैं हम

दुश्मन की जेब में तुम सब्र-ओ-शकेब में हम
तुम दस्त-ए-कोतही हो पा-ए-निगार हैं हम

वादी-ए-जुस्तुजू से गुज़रीं तो क्या अजब है
वारफ़्ता कैसे कैसे लैल-ओ-नहार हैं हम

क्या बादा-ए-जवानी मर्द-आज़माँ नशा था
अब ऐ 'क़लक़' वबाल-ए-ख़्वाब-ओ-ख़ुमार हैं हम
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Qalaq Merathi
ख़ुशी में भी नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ हूँ
ज़मीन-ओ-आसमाँ का तर्ज़-दाँ हूँ

मैं अपनी बे-निशानी का निशाँ हूँ
हुजूम-ए-मातम-ए-उम्र-ए-रवाँ हूँ

तिरे जाते ही मेरी ज़ीस्त तोहमत
नहीं मिलता पता अपना कहाँ हूँ

ग़ुबार-ए-कारवान-ए-मोर है ज़ीस्त
ये ख़त्त-ए-यार से आशुफ़्ता-जाँ हूँ

नहीं कुछ काम बख़्त-ओ-आसमाँ से
मैं नाकामी में अपनी कामराँ हूँ

नहीं दम मारने का दम और उस पर
सरापा शम्अ'' साँ शक्ल-ए-ज़बाँ हूँ

ख़ुदा ही गर न दे माशूक़-ओ-मय को
तो क्यूँँ फिर मोहतसिब से सरगिराँ हूँ

वहाँ का रंग-ए-पर्रां आसमाँ है
मैं जिस आलम की तस्वीर-ए-गुमाँ हूँ

कोई आवारा मिल जाए तो पूछूँ
किधर से आया हूँ जाता कहाँ हूँ

निकल जाता है जी हर आरज़ू पर
पए-ख़ून-ए-जवानी में जवाँ हूँ

मिरा ग़म इशरत-ए-रफ़्ता का नग़्मा
कि मिस्ल-ए-गर्द बू-ए-कारवाँ हूँ

कवाकिब-हा-ए-क़िस्मत आसमाँ पर
न हूँ क्यूँँ नुक्ता-चीं मैं नुक्ता-दाँ हूँ

'क़लक़' बे-रौनक़ी रौनक़ है मेरी
बहार-ए-उम्र-ए-हस्ती की ख़िज़ाँ हूँ
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तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़
तिरी उम्र सारी यूँँही कटी तू हमेशा यूँँही जिया 'क़लक़'

हुआ दिल के जाने का अब यक़ीं कि वो दर्द-ए-बर में मरे नहीं
न वो इज़्तिराब-ए-क़ज़ा कहीं न वो हश्र-ख़ेज़ बला 'क़लक़'

मुझे हश्र कर दिया बैठना मुझे क़हर हो गया ठहरना
है बसान-ए-सब्र गुरेज़-पा नहीं ग़म-गुसार मिरा क़लक़

उन्हें नाला करने का रंज क्या उन्हें आह भरने का रंज क्या
उन्हें मेरे मरने का रंज क्या उन्हें मेरे जाने का क्या क़लक़

यही रश्क ने दिए मशवरे कभी पर्दा उन का न खोलिए
मिरे जी ही जी में फिरा किए मिरे दिल ही दिल में रहा क़लक़

न तो रोए ग़ैर न घर रहे न शब-ए-फ़िराक़ में मर रहे
न वफ़ा करे न सितम सहे न जफ़ा हुई न हुआ क़लक़

न वो मैं रहा न वो तू रहा न वो आरज़ू न वो मुद्दआ'
हुआ ज़िंदगी का भी फ़ैसला मगर एक तेरा रहा क़लक़

रहे लाख सद
में नफ़स नफ़स जिए क्यूँँ कि कोई पराए बस
शब-ए-वस्ल मरने की थी हवस शब-ए-हिज्र जीने का था क़लक़

नहीं चैन उन को भी एक दम कि है फ़िक्र-ए-जौर का ग़म सा ग़म
हुए मुझ पे रोज़ नए सितम रहा उन को रोज़ नया क़लक़

करे रब्त कोई किसी से क्या कि उठा तरीक़ निबाह का
न करेगी तुझ से वफ़ा जफ़ा न करेगा मुझ से वफ़ा क़लक़

मैं जला तो शो'ले में जोश था जो हुआ मैं ख़ाक है ज़लज़ला
मैं हज़ार शक्ल बदल चुका प किसी तरह न छुपा क़लक़

नहीं तेरे फिरने का कुछ गिला कि ज़माना सारा बदल गया
जो शब-ए-विसाल में चैन था वही रोज़-ए-हिज्र बना क़लक़

वो है इल्तिफ़ात दम-ए-सितम कि ज़ियादा इस से नहीं करम
मिरे चाक-ए-दिल का रफ़ू अलम मिरे दर्द-ए-जाँ की दवा क़लक़

गए वाँ भी पर न घटा अलम छुटे सब से पर न छुटा अलम
मिरे पास से न हटा अलम मिरे साथ से न टला क़लक़

अभी था सला-ए-ज़न-ए-सबक़ अभी थी किताब-ए-वरक़-वरक़
कभी मदरसे में रहा 'क़लक़' कभी मय-कदे में रहा 'क़लक़'
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Qalaq Merathi
उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं
गर्द-बाद-ए-ग़ुबार-ए-दिल हूँ मैं

काबे तक साथ आया शौक़-ए-सनम
हाए बुत-ख़ाना क्या ख़जिल हूँ मैं

हैफ़ किस मुद्दई की जाँ है तू
हाए किस आश्ना का दिल हूँ मैं

तुझ को दूँ क्या जवाब ऐ दावर
अपने ही आप मुन्फ़इल हूँ मैं

तेरी नाज़ुक तनी पे ग़ौर न की
अपनी उम्मीद से ख़जिल हूँ मैं

न हिला उस के दर से ता-महशर
मरक़द-ए-आरज़ू की सिल हूँ में

ख़ाक-ए-हस्ती की गर्द-बाद है तू
आतिश-ए-दिल की आब-ओ-गिल हूँ मैं

हद नहीं कोई अपनी हालत की
कि निगाहों में मुंतक़िल हूँ मैं

छा गया ये तसव्वुर उस बुत का
नक़्श-ए-चीं और बुत-ए-चगिल हूँ मैं

ज़र्रा सी ज़िंदगी पहाड़ हुई
आँख का अपनी आप तिल हूँ मैं

ऐ 'क़लक़' क्यूँँ कि छोड़ दूँ वहशत
वज़्अ''' में अपनी मुस्तक़िल हूँ मैं
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Qalaq Merathi
न पहुँचे हाथ जिस का ज़ोफ़ से ता-ज़ीस्त दामन तक
सुराग़-ए-ख़ूँ अब इस का मर के जाए ख़ाक गर्दन तक

सर-ओ-सामाँ से हैं ये बे-सर-ओ-सामानियाँ अपनी
कि है जोश-ए-जुनूँ मेरा गरेबाँ-गीर दामन तक

न की ग़फ़लत से क़द्र-ए-दिल अबस इल्ज़ाम दिलबर पर
मता-ए-ख़ुफ़्ता के जाने के सौ रस्ते हैं रहज़न तक

ये हीला भी नहीं कम मौत के आने को गर आए
न आए जो कि बालीं पर वो क्या जाएगा मदफ़न तक

कुछ ऐसा इख़्तिलात आपस से उट्ठा इस ज़माने में
न क़ातिल आए है मुझ तक न जाए मौत दुश्मन तक

मिरी मेहनत का ज़ाएअ' होना ही तो इक क़यामत है
कि बाद-ओ-बर्क़ आफ़त में रहेंगे मेरे ख़िर्मन तक

वफ़ा की नज़्र है मेरी ही जान-ए-हसरत-आलूदा
असर की क़द्र है मेरी ही आह-ए-क़ाफ़िला-ज़न तक

ग़ुबार-ए-दिल किसी ढब से न क़ातिल का हुआ साबित
कि साफ़ उस की हवा की तेग़ मुझ से मेरे कुश्तन तक

मैं अपने हौसले से और वो अपने जा
में से बाहर
न ख़ंजर का उसे खटका न याँ सर्फ़ा है गर्दन तक

नहीं होता रफ़ू चाक-ए-गरेबान-ए-फ़ना हरगिज़
मंगाईं चर्ख़-ए-चारुम से अगर ईसा की सोज़न तक

गिराँ-जानी चमन में भी निशाना हो गई आख़िर
कि बार-ए-दोश-ए-गुलबन है मिरी शाख़-ए-नशेमन तक

'क़लक़' मरता है और होता है मातम का ये हंगामा
मगर रोना है इस का तू न आया बज़्म-ए-शेवन तक
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Qalaq Merathi
ग़ैर शायान-ए-रस्म-ओ-राह नहीं
कब वो 'आशिक़ है जो तबाह नहीं

ऐ फ़लक दौर-ए-हुस्न में उस के
तुझ को कुछ फ़िक्र-ए-मेहर-ओ-माह नहीं

रब्त-ए-दुश्मन से भी वो बद-बर है
अब किसी तरह से निबाह नहीं

कम निगाही को उन की देखते हैं
उन पे भी अब हमें निगाह नहीं

पर्दा कब तक रहेगा ऐ ज़ालिम
अख़्तर-ए-मुद्दई सियाह नहीं

ज़ुल्म की क़द्र के लिए है रहम
दाद कुछ बहर-ए-दाद-ख़्वाह नहीं

हैफ़ क़ज़्ज़ाक़ी-ए-ज़माना हैफ़
रस्म-ओ-रह बहर-ए-रस्म-ओ-राह नहीं

है गदा शाह बल्कि शाहंशाह
सतवत-ए-क़हर-ए-बादशाह नहीं

उल्फ़त और तुम से हाए हाए न हो
लब-ए-दुश्मन पे आह आह नहीं

पस्ती-ए-तालेअ' बहर-ए-ख़ूबी-ए-फ़न
क्या वो यूसुफ़ जो ग़र्क़-ए-चाह नहीं

अर्सा-ए-नीस्ती-ओ-हस्ती से
बच के चलने की कोई राह नहीं

ऐ 'क़लक़' क्या हुआ बुढ़ापे में इश्क़ कुछ सैर-ए-सुबह-गाह नहीं
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Qalaq Merathi
उन से कहा कि सिद्क़-ए-मोहब्बत मगर दरोग़
कहने लगे ये सच है कि हर तरह पर दरोग़

दुज़द-ए-हिना पे दुज़दी-ए-जाँ का है इत्तिहाम
ख़ून-ए-दिल-ओ-जिगर सर-ए-तेग़-ए-नज़र दरोग़

आना सबाह-ए-हश्र का शाम-ए-फ़िराक़ झूट
उड़ जाना शोर-ए-नाला से रंग-ए-सहर दरोग़

हर लहजा तेग़ जानना अबरू का इफ़्तिराक
हर लम्हा ज़ौक़-ए-क़त्ल में सर हाथ पर दरोग़

सर संग-ए-दर से फोड़ना वहशत में ना-सुबूत
गिर जाना सैल-ए-अश्क से दीवार-ओ-दर दरोग़

ख़ून-ए-जिगर बजाए मय-ए-नाब ना-दुरुस्त
आतिश-ज़नी-ए-शोला-फ़िशाँ चश्म-ए-तर दरोग़

जाँ और फिगार-ए-तीर-ए-मिज़ा किस क़दर ग़लत
दिल और असीर-ए-रिश्ता-ए-मू सर-ब-सर दरोग़

बे-जाँ हो और जीते हो फ़ुर्क़त में इख़तिराअ'
बे-दिल हो और नियाज़-ए-निगह है जिगर दरोग़

टुकड़े निगाह-ए-नाज़ से दिल आप का दुरुस्त
वहम-ए-नज़र से दूर हमारी कमर दरोग़

उड़ता है रंग साथ ही आवाज़-ए-नाज़ के
चीन-ए-जबीं से आप को इतना ख़तर दरोग़

है ना-सिपास-ए-वस्ल दिल-ए-हिज्र-ए-दोस्त ख़ब्त
है पाक-बाज़ चश्म-ए-हक़ीक़त-निगर दरोग़

कूचे में मेरे ले के सबा आएगी बजा
तुम ख़ाक हो गए हो सर-ए-रहगुज़र दरोग़

हम को तलाश आप की और दर-ब-दर मुहाल
जज़्ब-ए-दिल-ओ-जिगर से उमीद-ए-असर दरोग़

हम और नाअ'श उठाने को आते ख़िलाफ़-ए-अक़्ल
मर्ग-ए-शब-ए-फ़िराक़ की हर सू ख़बर दरोग़

ये ज़ब्त-ए-वज़्अ' नाम 'क़लक़' क़िस्सा मुख़्तसर
शाइ'र हो हर तरह है तुम्हारा हुनर दरोग़
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Qalaq Merathi
कहिए क्या और फ़ैसले की बात
वस्ल है इक मुआ'मले की बात

उस के कूचे में लाख सर-गरदाँ
एक यूसुफ़ के क़ाफ़िले की बात

गेसू-ए-हूर और ज़ाहिद बस
ज़िक्र-ए-काकुल है सिलसिले की बात

ग़ैर से हम को रश्क-ए-सल्ल-ए-अला
कहिए कुछ अपने हौसले की बात

एक आलम को कर दिया पामाल
ये भी है कोई मश्ग़ले की बात

क्या बिगड़ना उन्हें नहीं आता
सुल्ह भी है मुजादले की बात

देख क्या कहते हैं ख़ुदास हम
इक ज़रा है मुक़ाबले की बात

इस क़दर और क़रीब-ए-ख़ातिर तू
अक़्ल से है ये फ़ासले की बात

दावर-ए-हश्र से भी हाल कहा
नहीं रुकती कहीं गिले की बात

न चले पाँव और न सर ही चले
बे-सर-ओ-पा है आबले की बात

कोई मज़मूँ कभी न पेश आया
शे'र में की है फिर सिले की बात

हम-नशीं अर्श हिल गया शब-ए-हिज्र
पूछ मत जी के ज़लज़ले की बात

ऐ क़लक़ दिल को सोच कर देना
कुछ नहीं ठीक वलवले की बात
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Qalaq Merathi
बे-गाना-अदाई है सितम जौर-ओ-सितम में
हम छुपने न पाए कि छुपा आप वो हम में

कुछ इल्म-ओ-ख़िरद पर नहीं तक़दीर की मिक़दार
अंदाज़ा-ए-पैमाँ न ज़्यादा में न कम में

है तर्ज़-ए-मोहब्बत ही दिल-आशोब वगर्ना
कुछ बात अदावत की न तुम में है न हम में

हर क़ाफ़िला-ए-दर्द-रसीदा की है मंज़िल
क्या जानिए आराम है क्या मुल्क-ए-अदम में

यारब हो बुरा इस हवस-ए-दिल का नहीं चैन
इफ़्लास भी खोया तलब-ए-जाह-ओ-हशम में

बे-हिस हवस-ए-वस्ल में ऐसे तो हुए हैं
लज़्ज़त है अज़िय्यत में हलावत है न सम में

अफ़्साना-ए-मय-ख़ाना है वाइ'ज़ की ज़बाँ पर
अंदाजा-ए-पैमाना है क़िंदील-ए-हरम में

मुझ को ही नहीं बे-ख़ुद-ओ-बेहोश क्या कुछ
दीवाने बने आप भी तशवीश-ए-सितम में

उस ज़ोहद-लिबासी के 'क़लक़' तेरे हैं क़ाइल
किस ढंग से लाया पिसर-ए-शैख़ को दम में
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Qalaq Merathi

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