ranjo gham ke bhi hain kitne pahluu alag | रंजो ग़म के भी हैं कितने पहलू अलग

  - Rachit Sonkar

रंजो ग़म के भी हैं कितने पहलू अलग
मेरे आँसू अलग उसके आँसू अलग

मत करो अपनी तुलना किसी और से
सारे फूलों की होती है ख़ुश्बू अलग

उसकी आँखों की है ऐसी कारीगरी
जैसे बैठे हो पलकों पे जुगनू अलग

मुझको मिलती है उल्फ़त यहाँ तौल कर
मेरी ख़ातिर हैं उसके तराज़ू अलग

देखो कैसा तमाशा किया ज़ीस्त ने
हो गया इश्क़ में मैं अलग तू अलग

रात भर मुझको वो सोने देती नहीं
मेरे तन-मन पे करती है जादू अलग

वो महकती ही रहती है शाम-ओ-सहर
उसकी ज़ुल्फ़ों में बसती है ख़ुश्बू अलग

उसके कंगन की खन-खन अलग है रचित
उसकी पायल से बजते हैं घुँघरू अलग

  - Rachit Sonkar

Gham Shayari

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