जाम हाथों में था पर पिया ही नहीं
इक बदन जिसको हमने छुआ ही नहीं
देख कर मैं जिसे होश खोने लगूँ
फूल ऐसा अभी तक खिला ही नहीं
याद मेरी उधर उसको आने लगी
और मुझको इधर कुछ हुआ ही नहीं
इश्क़ हमने किया इश्क़ तुमने किया
वो अलग बात है दिल लगा ही नहीं
देख सकते थे आँखों से सब कुछ मगर
हिज्र के वक्त कुछ भी दिखा ही नहीं
उसने जो कुछ भी माँगा उसे मिल गया
हमने जो कुछ भी माँगा मिला ही नहीं
जो मिले हैं हमें इश्क़ की चोट से
ऐसे ज़ख़्मों की कोई दवा ही नहीं
उसने पूछा कि क्यों रो रहे हो 'रचित'
मुस्कुरा कर कहा कुछ पता ही नहीं
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