हैं अपनी कही, अनकही से परेशाँ
सुख़न-वर हैं ख़ुद शा'इरी से परेशाँ
चराग़ाँ से पहले ज़रा सोचना था
है सच में कोई तीरगी से परेशाँ?
नमक घोलते-घोलते थक गया है
समुंदर है ज़िद्दी नदी से परेशाँ
लगाएँ भी आख़िर ये इल्ज़ाम किसपर?
किसी के सबब हैं, किसी से परेशाँ
तुम अपने ही अपने में जिस तौर गुम हो
कहीं हो न जाना ख़ुदी से परेशाँ
— Rohan Kaushik















