इस सेे झगड़ा, उस सेे यारी होती है
एक मुसीबत कितनी भारी होती है
जितने पहलू रोज़ बदलती है क़िस्मत
उतनी कब? किस की? तैयारी होती है
छोटी-छोटी बातों पर भर आता है
कितनी छोटी दिल की क्यारी होती है
हम बोलें तो झूठ गुनह हो जाता है
तुम बोलो तो दुनियादारी होती है
लोग भटक जाते हैं ऐसी बातों से
ता'रीफ़ों से भी दुश्वारी होती है
शौक़ अगरचे, छोड़ा भी जा सकता है
ज़िम्मेदारी, ज़िम्मेदारी होती है
— Rohan Kaushik















