
आसमाँ में कहीं पे वो घर है
जिस
में रहता हमारा रहबर है
जो मुयस्सर नहीं है आँखों को
शख़्स हर पल वो दिल के अंदर है
अब यहाँ से अकेले जाओ तुम
अब यहाँ से ज़मीं बराबर है
मुस्कुराने को महफ़िलें हैं सौ
दुख सुनाने को उस का ही दर है
बेझिझक आओ दिल के मंदिर में
देव हो तुम तुम्हारा ही घर है
— Sapna Jain















