वो ऐसे है महफ़िल पे छाई हुई

कि इक हूर जन्नत से आई हुई

वो इक शख़्स महफ़िल से क्या उठ गया
बुझी रात भी जग-मगाई हुई

हर इक सम्त है नफ़रतों का धुआँ
है ये आग किस की लगाई हुई

जुनूँ में लबों पर न आ जाए वो
जो हसरत है दिल में दबाई हुई

हर इक लफ़्ज़ सौ बार बरता हुआ
हर इक दास्ताँ है सुनाई हुई

ये रुतबा है मेहनत से पाया हुआ
ये शोहरत है मेरी कमाई हुई

— Sapna Jain

More by Sapna Jain

Other ghazal from the same pen

See all from Sapna Jain →

Greed Shayari

Shers of greed.

All Greed Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling