बस इतनी बात थी दुनिया से जो छुपाना था
कुछ एक लोग थे बस जिन को आज़माना था
ठहर गया हूँ मुहब्बत के उस क़बीले में
जहाँ से मुझ को बहुत जल्द लौट जाना था
मुसाफिरों की सहूलत के वास्ते तुम को
पड़ा हुआ है जो पत्थर वही हटाना था
मैं याद करता हूँ उस को उदास लम्हों में
इस एक झूठ पे उस को यक़ीं दिलाना था
जो राज़ तुम को बताया है सच नहीं है वो
तुम्हें गले से लगाने का इक बहाना था
बस एक शिकवा है तुम से के मुझ से मिलने कभी
हक़ीक़तों में नहीं ख़्वाब में तो आना था
— Shahzan Khan Shahzan'















