"कोई नहीं मिला हमें"

तमाम उम्र हम न जाने कौन से ख़ुदा को पूजते रहे
न जाने कौन सी नदी के पानियों में चाँद ढूँडते रहे
पराई रौनकों में ख़ुश रहे
अजीब रौशनी थी जिस
में कुछ नज़र न आ सका
शहर में रोज़गार ढूँडते देहातियों को क्या पता
बड़े घरों की लड़कियों की आदतें
कभी किसी के वास्ते गर अपने-आप को सँवारते तो और भी बुरे लगे
कभी किसी की आँख से बहे भी तो पता नहीं चला हमें
कभी किसी को प्यार का यक़ीं न दिला सके
फ़क़त हम अपने दोस्तों के नामाबर बने रहे
कोई नहीं मिला हमें
हुजूम-दर-हुजूम हाथ थे जो एक-दूसरे को चूमते चले गए
कोई नहीं मिला हमें
हमारा दिल हमारी जेब में पड़ा रहा
जहान दिल से देखते या जेब से?
ये फ़ैसला नहीं हुआ कभी
मगर हमें ये इल्म था
ख़ुदा के घर में सब के सामने
किसी के होंठ चूमना बुरा नहीं

— Shehbaz Gohar

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