"तमाशा बन के रह गए"
लहू की प्यास बुझ सकी न इश्क़ के बाज़ार में
तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में
उम्मीद एक झूठ थी जो उम्र भर चलती रही
हयात की क़बा हर एक मोड़ पर जलती रही
न जीत की ख़ुशी मिली न हार का मलाल है
कि अब हमारी मौत भी एक ज़ीस्त का सवाल है
सबक़ वफ़ा का पढ़ के हम फ़ना के दर पे आ गए
जो ख़्वाब हमने देखे थे वो राख बन के छा गए
कहाँ की ये उम्मीदें हैं कहाँ की हैं नवाज़िशें
फ़क़त फ़रेब-ए-दिल रहीं ये इश्क़ की सब ख़्वाहिशें
गुनाह-ए-आरज़ू की हमने वो सज़ा है पाई अब
कि अपने साये से भी यूँ डर रही तन्हाई अब
अजब ये मुंसिफ़ी रही है दिल के कार-ओ-बार में
तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में
न सर पे कोई छत रही न पाँव के तले ज़मीं
मगर ये ज़िद कि हम सा कोई सरफिरा यहाँ नहीं
चलो कि आज जिस्म की ये बेड़ियाँ उतार दें
ये रूह भी तो यार के ही नाम पर हम वार दें
गले में आग है दबी ये आँख है मक़ाम-ए-ख़ूँ
नज़र में रक़्स कर रहा है मौत का ही इक जुनूँ
मज़ा ही कुछ अलग रहा है हार की पुकार में
तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में
कलेजा चीर कर यहाँ तमाशा हम दिखाएँगे
हँसेगी ये जो दुनिया हम भी साथ मुस्कुराएँगे
जहाँ पे क़त्ल हो चुका है हर हसीं ख़याल का
बचा है क्या जवाब अब यहाँ किसी सवाल का
दफ़्न हैं हम कब के अपनी हसरतों के ढेर में
उजाला ढूँढते रहे हम उम्र भर अंधेर में
अजीब लुत्फ़ आ रहा है इश्क़ के बुख़ार में
तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में















