रुख़्सती के दिन चुकाना होगा जुर्माना सनम
इक दफ़ा देना पड़ेगा फिर से ये शाना सनम
भूल कर मुझ को जो तुम ने भूल की थी इक दफ़ा
ज़िक्र भी उस भूल का लब पर नहीं लाना सनम
तुम सजा देना खिले सदहा गुलाबों से मुझे
आख़िरी होगा तुम्हारा ये ही हर्जाना सनम
जो छुपा कर आज भी रक्खे हैं ख़त संदूक़ में
चाहते हैं उन ख़तों को साथ ले जाना सनम
चाँद के जाने से ही रातें बदलती सुब्ह में
जाते जाते बस यही कहता है दीवाना सनम
— Dr Bhagyashree Joshi















