हँसने रोने वाले अच्छे लगते हैं
छोटे छोटे जज़्बे अच्छे लगते हैं
चाँदी जैसी धूप में तार पे टँगे हुए
रंग बिरंगे कपड़े अच्छे लगते हैं
जिस बरगद के नीचे गौतम बैठा हो
उस बरगद के साए अच्छे लगते हैं
शहर से दूर इक छोटी सी बस्ती वाले
वो जिन को बल-बूटे अच्छे लगते हैं
कॉफ़ी शॉप की बाहर वाली टेबल पर
दोनों साथ में बैठे अच्छे लगते हैं
घूम घुमाकर सारी दुनिया में 'तजदीद'
वापिस अपने रस्ते अच्छे लगते हैं
— Tajdeed Qaiser















