जाने ये किस ओर किधर जाता है
लेकिन तय है वक़्त गुज़र जाता है
ठोकर का ही शिकार होता है बस
पत्थर वो राह का जिधर जाता है
तन्हा तन्हा जी तो लेता है पर
ऐसे जीता है जो मर जाता है
जबसे मैं ने उस से इश्क़ किया है
हर शय में वो शख़्स उतर जाता है
सलमा उस को भूला नईं कहते गर
सुब्ह का भूला शाम को घर जाता है
— Salma Malik















