ज़िंदगी है अजल तो तू भी नहीं
सोचता हूँ अटल तो तू भी नहीं
तेरे होते भी सब ख़राब ही था
और फिर आज-कल तो तू भी नहीं
ऐ शगूफ़ों में रंग भरते शख़्स
इस उदासी का हल तो तू भी नहीं
जो तिरी जुस्तुजू में छोड़ दिया
उस का नेमुल-बदल तो तू भी नहीं
मुझ को ये जान कर उदासी हुई
कुछ मसाइल का हल तो तू भी नहीं
मैं भी 'ज़ोरेज़' कोई ज़मज़म हूँ
और फिर गंगा-जल तो तू भी नहीं
— Usama Zoraiz















