लिपटी हुई फिरती है नसीम उन की क़बास

गुल खिलते हैं हर गाम पे दामन की हवा से

दिल ऐसा दिया क्यूँ कि रहा कुश्ता-ए-जानाँ
तुम से नहीं ये शिकवा भी करना है ख़ुदा से

महरम हैं हमीं गर्मी-ए-गुफ़्तार से उन की
जो होंट जो आँखें हैं गिराँ-बार हया से

आहिस्ता करो चाक गुलो अपना गरेबाँ
गूँजे न चमन ग़ुंचों के हँसने की सदास

खोलेंगे उन्हीं हाथों के नाख़ुन गिरह-ए-दिल
जो बस्ता हैं रंगीनी-ओ-ख़ुशबू-ए-हिना से

ता'बीर के सहराओं में हैं ख़्वाब-ए-परेशाँ
दरिया को सराबों से सदा देते हैं प्यासे

लेते हो अगर नाम-ए-शहीदाँ तो है ये शर्त
जाँ जाए रहे पा न हटें राह-ए-वफ़ा से

— Waheed Akhtar

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