मय-कदा सा बना दिया घर में
और साक़ी बिठा दिया घर में
और साक़ी बिठा दिया घर में
उस की ज़िद थी कि एहतिमाम करूँ
मैं ने ख़ुद को बिछा दिया घर में
तेरे पहरे जगह जगह पा कर
ख़ुद को क़ैदी बना दिया घर में
तेरी क़ुर्बत थी आग थी क्या थी
मेरा सब कुछ जला दिया घर में
डर के अपने ही साए से मैं ने
हर दिए को बुझा दिया घर में
ख़ुद से रू-पोश ही भला था मैं
आइना क्यूँ लगा दिया घर में
नोच कर अपने बाल-ओ-पर 'आदिल'
मैं ने पिंजरा बना दिया घर में
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ये दिया ख़ूँ से जला फिर भी जला है तो सही
लाख रस्मन ही मिला मुझ से मिला है तो सही
लाख रस्मन ही मिला मुझ से मिला है तो सही
अन-कही बात समझ लो तो बड़ी बात है ये
मेरी ख़ामोश नवाई में सदा है तो सही
डगमगाता मुझे देखे तो सहारा दे कोई
ये जो लग़्ज़िश है तो लग़्ज़िश का मज़ा है तो सही
भीगी आँखें ये बताती हैं कि सुन कर मिरा हाल
कुछ न कुछ तुझ को भी एहसास हुआ है तो सही
कहें मग़रूर को बदमस्त मगर सच ये है
इंकिसारी में भी अपना ही नशा है तो सही
ज़िंदगी भर मिरी हस्ती में रचा हो जैसे
तुझ को देखा नहीं महसूस किया है तो सही
काविश-ए-ज़ीस्त है क्या अपनी ही हस्ती की तलाश
ख़ुद को पा लेना ही इंसाँ का सिला है तो सही
है जो आज़ुर्दगी उस की दम-ए-रुख़्सत 'आदिल'
तुझ को अंदाज़ा-ए-तजदीद-ए-वफ़ा है तो सही
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नज़र मेरी बसीरत को सदा महदूद रखती है
पस-ए-मंज़र नहीं देखा फ़क़त पेश-ए-नज़र जाना
जहाँ तक़दीर ले जाए वहाँ रस्ते नहीं जाते
किया था रुख़ इधर का क्यूँ लिखा था जब उधर जाना
हवाला ज़िंदगी का भी तुम्हारी ज़ुल्फ़ जैसा है
बिखरना फिर सँवर जाना सँवरना फिर बिखर जाना
जुनूँ की राह को अब तक समझ पाए नहीं साहब
कि अपने जिस्म को ढा कर फ़क़त जाँ से गुज़र जाना
डुबोया जिस ने कश्ती को उसे ही ना-ख़ुदा समझे
दिए थे जिस ने सारे दुख उसी को चारा-गर जाना
उन्हीं तारीक राहों से गुज़रना है तुम्हें 'आदिल'
चराग़-ए-जाँ जला कर तुम बिला ख़ौफ़-ओ-ख़तर जाना
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साज़-ए-हस्ती पे अभी झूम के गा ले मुझ को
ज़िंदगी से ये कहो और न टाले मुझ को
ज़िंदगी से ये कहो और न टाले मुझ को
मैं ने तो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ की दुआ माँगी थी
क्यूँ मिले ज़र्द चराग़ों के उजाले मुझ को
तुझ को पाने के लिए उमर गँवा दी मैं ने
हक़ तो बनता है कि तू अपना बना ले मुझ को
ये तो साक़ी की जगह और कोई बैठा है
ये जो गिन गिन के पिलाता है पियाले मुझ को
मैं ज़माने के झमेलों में धँसा जाता हूँ
उस से कहिए कि वो दलदल से निकाले मुझ को
अपनी ख़ामोश तमन्ना की अज़िय्यत से निकल
जो सुनाना है ज़रा खुल के सुना ले मुझ को
ना-तवानी ही मिरी ताब-ओ-तवाँ है 'आदिल'
मैं ने कब तुझ से कहा था कि बचा ले मुझ को
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दस्तूर था जो ग़म का पुराना बदल गया
सँभले न थे अभी कि ज़माना बदल गया
सँभले न थे अभी कि ज़माना बदल गया
शिकवा नहीं कि साग़र-ओ-मीना बदल गए
टूटा ख़ुमार कैफ़-ए-शबाना बदल गया
जो बाब थे अहम अभी होने थे वो रक़म
पर क्या कि लिखते लिखते फ़साना बदल गया
मश्क़-ए-सुख़न वही है मशक़्क़त भी है वही
कैसे करूँ यक़ीन ज़माना बदल गया
नग़्मा-सरा हैं हम तो उसी सुर में लय में हैं
पर लोग कह रहे हैं तराना बदल गया
क़ाएम पुराने हीलों बहानों पे आज भी
समझे थे इस का तर्ज़ बहाना बदल गया
मेरी थी क्या मजाल हक़ीक़त बदल सकूँ
ख़ाके तह-ए-ख़याल बनाना बदल गया
'आदिल' तुझे यक़ीं नहीं आया न आएगा
तेरा वो यार-ए-ग़ार पुराना बदल गया
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मसरूफ़ रहगुज़र पे चला जा रहा था मैं
फिर क्यूँ लगा कि सब से जुदा जा रहा था मैं
फिर क्यूँ लगा कि सब से जुदा जा रहा था मैं
ता'मीर-ए-ज़ात ही में लगी ज़िंदगी तमाम
ख़ालिक़ बना रहा था बना जा रहा था मैं
हासिल थीं जिन को राहतें वो भी फ़ना हुए
क्यूँ अपनी मुफ़्लिसी से डरा जा रहा था मैं
दरिया-ए-ज़ीस्त की यही मंज़िल थी आख़िरी
इक बहर-ए-बे-कराँ में गिरा जा रहा था मैं
समझा था आइने में मिरा अक्स ही नहीं
ज़ाहिर था और सब से छुपा जा रहा था मैं
पहले तो कू-ए-यार की फिर दार की तलब
दलदल में ख़्वाहिशों की धँसा जा रहा था मैं
मैं गर्द-ए-राह था मगर ए'जाज़ देखिए
हर कारवाँ के साथ उड़ा जा रहा था मैं
रुकने में डर ये था कि तवाज़ुन बिगड़ न जाए
'आदिल' इसी गुमाँ में चला जा रहा था मैं
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कम-माएगी न पूछ मिरी बज़्म-ए-ग़ैर में
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
मैं ताजिरान-ए-इश्क़ के बारे में क्या कहूँ
इन का जुनूँ है गर्मी-ए-बाज़ार की तरह
ख़ुद-साख़्ता बुतों को मैं अब तोड़-ताड़ कर
पूजूँगा बस उसी को परस्तार की तरह
ज़ौक़-ए-नज़र को आप समझते हैं गर गुनाह
नादिम खड़ा हूँ मैं भी गुनहगार की तरह
देखी है मैं ने शाख़ से पत्तों की रुख़्सती
जाने न दूँगा अब तुझे हर बार की तरह
ज़ाद-ए-सफ़र की फ़िक्र न मंज़िल का हो ख़याल
राह-ए-तलब में आओ तलबगार की तरह
चाहा है तुम को यूँ कि तुम्हें भी ख़बर न हो
सोचा है तुम को अन-कहे अश'आर की तरह
कहने को कोई बंद-ओ-सलासिल नहीं मगर
सब हैं फ़सील-ए-जाँ में गिरफ़्तार की तरह
'आदिल' रुख़-ए-निगार नहीं दिल का आइना
इक़रार-ए-ख़ास होता है इनकार की तरह
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बस हर इक रात यही जुर्म किया है मैं ने
ला के ख़्वाबों में तुझे देख लिया है मैं ने
ला के ख़्वाबों में तुझे देख लिया है मैं ने
हर बरस ज़ीस्त का लम्हा सा लगा है लेकिन
बाज़ लम्हों में तो सदियों को जिया है मैं ने
छूटे जाते हैं सभी अहल-ए-ख़राबात-ए-जुनूँ
क्या अजब अक़्ल से सौदा ये किया है मैं ने
साग़र-ए-मर्ग को सुक़रात ने पी कर ये कहा
ज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं ने
अपने हर ख़्वाब की ता'बीर को पाने के लिए
इक समुंदर था जिसे पार किया है मैं ने
तुम नहीं जानते मक़्तल से डराने वालो
जाँ का नज़राना कई बार दिया है मैं ने
कैसे मुमकिन है कि मैं तुझ से तिरी बात करूँ
तेरे कहने पे तो होंटों को सिया है मैं ने
मय-कशी में भी कई दौर गुज़ारे 'आदिल'
कभी चुल्लू कभी साग़र से पिया है मैं ने
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हम अपने ज़ख़्म सभी को दिखा नहीं सकते
जो शिकवा तुम से है सब को सुना नहीं सकते
जो शिकवा तुम से है सब को सुना नहीं सकते
मिरे ख़याल की गहराई को ज़रा समझो
कि सिर्फ़ लफ़्ज़ तो मतलब बता नहीं सकते
मलाल ये है कि साक़ी तो बन गए साहब
शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते
अजब है फूल की फ़ितरत उसे मसल कर तुम
महकते हाथों की ख़ुश्बू छुपा नहीं सकते
लिखा गया जो मुक़द्दर में हर्फ़-ए-आख़िर है
तुम अपनी मर्ज़ी से इस को मिटा नहीं सकते
हज़ारों हीले बहाने तराश लो फिर भी
तुम अपने चेहरे की ख़िफ़्फ़त छुपा नहीं सकते
अब एक हम हैं कि सदियाँ गुज़ार दें 'आदिल'
और एक वो हैं कि लम्हा बता नहीं सकते
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तुम को आते हुनर जो रहज़न के
बस तुम्हीं मीर-ए-कारवाँ होते
बैर हम से सही मगर सोचो
हम न होते तो तुम कहाँ होते
ज़िंदगी वो जगह दिखा दे अब
तुझ को पाते तो हम जहाँ होते
उन की महफ़िल में दिल नहीं लगता
जब वो औरों में शादमाँ होते
ये मुकम्मल अगर जहाँ होता
फिर ख़लाओं में क्यूँ जहाँ होते
सोच में क़ुर्बतें अगर होतीं
फ़ासले यूँ न दरमियाँ होते
तुम ही गोशा-नशीन थे 'आदिल'
वर्ना चर्चे कहाँ कहाँ होते
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