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हम से तो राह-ओ-रस्म है अग़्यार की तरह  - Ahmad Adil

हम से तो राह-ओ-रस्म है अग़्यार की तरह
दुनिया पे मेहरबान हैं ग़म-ख़्वार की तरह

कम-माएगी न पूछ मिरी बज़्म-ए-ग़ैर में
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह

मैं ताजिरान-ए-इश्क़ के बारे में क्या कहूँ
इन का जुनूँ है गर्मी-ए-बाज़ार की तरह

ख़ुद-साख़्ता बुतों को मैं अब तोड़-ताड़ कर
पूजूँगा बस उसी को परस्तार की तरह

ज़ौक़-ए-नज़र को आप समझते हैं गर गुनाह
नादिम खड़ा हूँ मैं भी गुनहगार की तरह

देखी है मैं ने शाख़ से पत्तों की रुख़्सती
जाने न दूँगा अब तुझे हर बार की तरह

ज़ाद-ए-सफ़र की फ़िक्र न मंज़िल का हो ख़याल
राह-ए-तलब में आओ तलबगार की तरह

चाहा है तुम को यूँ कि तुम्हें भी ख़बर न हो
सोचा है तुम को अन-कहे अशआ'र की तरह

कहने को कोई बंद-ओ-सलासिल नहीं मगर
सब हैं फ़सील-ए-जाँ में गिरफ़्तार की तरह

'आदिल' रुख़-ए-निगार नहीं दिल का आइना
इक़रार-ए-ख़ास होता है इंकार की तरह

- Ahmad Adil

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