Ahmad Shanas

Top 10 of Ahmad Shanas

    दश्त-ए-उम्मीद में ख़्वाबों का सफ़र करना था
    तू कि इक लम्हा-ए-नापैद बसर करना था

    हम ने क्यूँ आपसी अज़दाद के नुक्ते ढूँडे?
    हम ने तो ख़ुद को बहम शीर-ओ-शकर करना था

    नक़्श बनता ही नहीं संग-ए-समाअत पे कोई
    कुंद अल्फ़ाज़ को फिर तीर-ओ-तबर करना था

    साअत-ए-दर्द कि बे-चेहराबे-नाम रही
    क़तरा-ए-अश्क कि महफ़ूज़ गुहर करना था

    तिश्नगी माही-ए-बे-आब सी लिख होंटों पर
    वर्ना यूँ बोसा-ए-साग़र से हज़र करना था

    मुझ पे आयत न कोई लफ़्ज़ ही उतरा 'अहमद'
    मेरी मुश्किल कि बयाँ मुझ को सफ़र करना था
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    Ahmad Shanas
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    है वाहिमों का तमाशा यहाँ वहाँ देखो
    हमारे पास मुकम्मल ख़ुदा कहाँ देखो

    दिल-ओ-दिमाग़ के अंदर अना की गूँज सुनो
    बला सी कोई लहू में रवाँ-दवाँ देखो

    नफ़स का साँप कहाँ ज़ेर होने वाला है
    फिर इस के ब'अद कोई और इम्तिहाँ देखो

    अब अपने घर के लिए इक नई ज़मीं सोचो
    ज़मीं के सर पे कोई ताज़ा आसमाँ देखो

    इस इक सवाल के कितने अज़ाब झेल चुका
    कुछ और दर्द बनू और इम्तिहाँ देखो

    गुज़र के जाना है वहशत के एक दरिया से
    यक़ीं न हो तो यहाँ रास्ता कहाँ देखो

    कहाँ से आएगी अब रौशनी मोहब्बत की
    बहुत धुआँ है मकानों के दरमियाँ देखो

    मैं बे-यक़ीन हूँ ऐसा कि मेरे हाथों में
    तमाम आयतें सूरज की राएगाँ देखो

    फटा हुआ किसी उर्यां सवाल जैसा है
    हमारे सर पे ये रहमत का साएबाँ देखो

    निशान रेत के आए हैं मेरे हिस्से में
    निकल गया है बहुत दूर कारवाँ देखो

    मसीह मौत का पैग़ाम ले के आया है
    अब और कौन बचाएगा मेरी जाँ देखो

    मिरे हुरूफ़ अधूरी उड़ान जैसे हैं
    मिरा शुऊर मआ'नी का आसमाँ देखो

    वो एक लम्हा हयात-आश्ना लिखो 'अहमद'
    वगर्ना सारी कहानी ही राएगाँ देखो
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    मोहब्बतों को कहीं और पाल कर देखो
    मता-ए-जाँ को बदन से निकाल कर देखो

    बदल के देखो कभी निस्बतों की दुनिया को
    बदन को रूह के ख़ाने में डाल कर देखो

    सुनो उसे तो समा'अत से मावरा हो कर
    जो देखना हो तो आँखें निकाल कर देखो

    यक़ीन दश्त से फूटेगा आब-ए-जू की तरह
    कि हर्फ़-ए-''ला'' की गवाही बहाल कर देखो

    नफ़स नफ़स है यहाँ मक़बरा अक़ीदत का
    ये मक़बरों का जहाँ पाएमाल कर देखो

    इसी हवा में मोहब्बत का दीप जलता है
    इसी जहाँ को जहान-ए-विसाल कर देखो

    वो संग दे तो हरारत निचोड़ लो अपनी
    जो फूल दे तो निगाह-ए-कमाल कर देखो

    फिर उस के ब'अद कोई डर नहीं तलातुम का
    उस एक बूँद के ग़म को विशाल कर देखो

    बदन की प्यास भी इक मावरा कहानी है
    हर एक बूँद को दरिया ख़याल कर देखो

    पलट के आएँगे सावन के रंग आँखों में
    तुम अपने-आप से रिश्ता बहाल कर देखो

    वो बोलता है पहाड़ों की ओट से अक्सर
    किसी पहाड़ से उस का सवाल कर देखो

    ये राज़ और कहाँ तक हमें निभाना है
    कभी तो रात में सूरज निकाल कर देखो

    तुम अपने गौहर-ए-यकता को इस तरह ढूँडो
    कि ख़ुद को बे-सर-ओ-सामाँ ख़याल कर देखो

    जो देखना हो कभी दोस्तों का दिल 'अहमद'
    खरे उसूल का पत्ता उछाल कर देखो
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    ज़माना हो गया है ख़्वाब देखे
    लहू में दर्द का शब-ताब देखे

    मनाज़िर को बहुत मुद्दत हुई है
    निगाहों में नया इक बाब देखे

    सितारा शाम को जब आँख खोले
    अचानक चाँद को पायाब देखे

    वो चिंगारी सी दे क़ुर्बत की मुझ को
    तो फिर सूरज की आब-ओ-ताब देखे

    कई रातें हुईं खिड़की में घर की
    तअल्लुक़ का नया महताब देखे

    मैं लफ़्ज़ों की नई फ़सलें उगाऊँ
    वो सन्नाटों के ताज़ा ख़्वाब देखे

    मेरी आँखों में सावन रंग भर दे
    मुझे ऐ काश वो सैराब देखे

    न वो आवारगी का शौक़ 'अहमद'
    न कोई दश्त को बेताब देखे
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    ये वक़्त रौशनी का मुख़्तसर है
    अभी सूरज तुलू-ए-मुंतज़र है

    शहादत लफ़्ज़ की दुश्वार-तर है
    किताबों में बहुत ज़ेर-ओ-ज़बर है

    अभी खुलने को है दर आसमाँ का
    अभी इज़हार का प्यासा बशर है

    ये दुनिया एक लम्हे का तमाशा
    न जाने दूसरा लम्हा किधर है

    जो देखा है वो सब कुछ है हमारा
    जो अन-देखा है वो उम्मीद भर है

    मैं ख़ुद ख़ाशाक-ए-गिरवीदा हूँ वर्ना
    मिरे हाथों में तिनका शाह पर है

    फिर इस के ब'अद बस हैरानियाँ हैं
    ख़बर वाला भी ख़ासा बे-ख़बर है

    मिरा नारा है जंगल आग जैसा
    मिरा क़लमा शिकस्ता बाल-ओ-पर है

    ज़बाँ मेरी सियासत चाटती है
    कि इस का ज़ाइक़ा शीर-ओ-शकर है

    ये अंधी प्यास का मौसम है 'अहमद'
    समुंदर रौशनी का बे-असर है
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    मेरी रातों का सफ़र तूर नहीं हो सकता
    तू न चाहे तो बयाँ नूर नहीं हो सकता

    मैं ने हिजरत के कई दौर कड़े देखे हैं
    मैं किताबों से कभी दूर नहीं हो सकता

    मेरी फ़ितरत कि मैं खिल जाता हूँ बे-मौसम भी
    मेरी आदत कि मैं मजबूर नहीं हो सकता

    तू ने किस शौक़ से लिक्खा है तआ'रुफ़ मेरा
    मैं किसी लफ़्ज़ में महसूर नहीं हो सकता

    मेरे अंदर भी तिरे नाम की चिंगारी है
    तू मिरे वास्ते क्यूँ तूर नहीं हो सकता

    जो यहाँ लफ़्ज़ की सरहद के उधर रहता है
    बस्तियों में कभी मशहूर नहीं हो सकता

    ज़िंदा इंसाँ उसे आबाद किया करते हैं
    घर किसी ख़्वाब से मामूर नहीं हो सकता

    घर के बाहर सभी लफ़्ज़ों के तमाशाई हैं
    घर के अंदर कोई मसरूर नहीं हो सकता

    जिस्म के सारे तक़ाज़े हैं अधूरे 'अहमद'
    ये तसव्वुर कभी भरपूर नहीं हो सकता
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    यहाँ हर लफ़्ज़ मअ'नी से जुदा है
    हक़ीक़त ज़िंदगी से मावरा है

    अभी चेहरे का ख़ाका बन रहा है
    अभी कुछ और भी मेरे सिवा है

    हमें जो कुछ मिला नाक़िस मिला है
    मगर ख़ुश-फ़हमियों की इंतिहा है

    कोई चेहरा नहीं ख़ुशबू का लेकिन
    तमाशा फूल वालों का लगा है

    मैं उस की बारिशों का मुंतज़िर हूँ
    वो मुझ से मेरे आँसू माँगता है

    यही बाइस है मेरी तिश्नगी का
    समुंदर मुझ से पानी माँगता है

    जहालत रोग था जो दिल के अंदर
    वही मज़हब हमारा हो गया है

    मुक़द्दस हो गया है झूट मेरा
    मुझे तो अब उसी का आसरा है

    मैं प्यासा हूँ पुराने मौसमों का
    मगर अब वो ज़माना जा चुका है

    कहानी बर्ग-ए-सोज़ाँ से इबारत
    वगर्ना बहर-ओ-बर भी हाशिया है

    नहीं है ख़्वाब सी तस्वीर जिस की
    तो फिर उस ख़्वाब की ता'बीर क्या है

    गुमाँ हंगामा-आराई का आदी
    यक़ीं तन्हाइयों में बोलता है

    ये दुनिया बे-ख़बर लोगों की 'अहमद'
    वो दुनिया का नहीं जो जानता है
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    जिस्म के बयाबाँ में दर्द की दुआ माँगे
    फिर किसी मुसाफ़िर से रौशनी ज़रा माँगे

    खो गए किताबों में तितलियों के बाल-ओ-पर
    सोच में हैं अब बच्चे क्या छुपाएँ क्या माँगे

    ज़ा'फ़रानी खेतों में अब मकान उगते हैं
    किस तरह ज़मीनों से दिल का राब्ता माँगे

    हम भी हो गए शामिल मसनूई तिजारत में
    हम कि चेहरा-सामाँ थे अब के आइना माँगे

    वर्ना इल्म नामों का उठ न जाए धरती से
    आदमी फले-फूले आओ ये दुआ माँगे

    इस से पेशतर कि ये रात मूँद ले आँखें
    नन्हे-मुन्ने जुगनू से रौशनी ज़रा माँगे

    वो सदाएँ देता है आख़िरी जज़ीरे से
    और हम निगाहों का हुस्न-ए-इब्तिदा माँगे

    किस के सामने रखिए खोल कर रज़ा अपनी
    और किस से जादू का बोलता दिया माँगे
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    मैं फ़तह-ए-ज़ात मंज़र तक न पहुँचा
    मिरा तेशा मिरे सर तक न पहुँचा

    उसे मेमार लिक्खा बस्तियों ने
    कि जो पहले ही पत्थर तक न पहुँचा

    तिजारत दिल की धड़कन गिन रही है
    तअल्लुक़ लुत्फ़-ए-मंज़र तक न पहुँचा

    शगुफ़्ता गाल तीखे ख़त का मौसम
    दोबारा नख़्ल-ए-पैकर तक न पहुँचा

    बहुत छोटा सफ़र था ज़िंदगी का
    मैं अपने घर के अंदर तक न पहुँचा

    ये कैसा प्यास का मौसम है 'अहमद'
    समुंदर दीदा-ए-तर तक न पहुँचा
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    Ahmad Shanas
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    कुछ शफ़क़ डूबते सूरज की बचा ली जाए
    रंग-ए-इम्काँ से कोई शक्ल बना ली जाए

    हर्फ़ मोहमल सा कोई हाथ पे उस के रख दो
    क़हत कैसा है कि हर साँस सवाली जाए

    शहर-ए-मलबूस में क्यूँ इतना बरहना रहिए
    कोई छत या कोई दीवार-ए-ख़याली जाए

    साथ हो लेता है हर शाम वही सन्नाटा
    घर को जाने की नई राह निकाली जाए

    फेंक आँखों को किसी झील की गहराई में
    बुत कोई सोच कि आवारा ख़याली जाए

    तिश्ना-ए-ज़ख़्म न रहने दे बदन को 'अहमद'
    ऐसी तलवार सर-ए-शहर उछाली जाए
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